भिलाई। साम्प्रदायिक सौहाद्र व सामाजिक एकता के लिए प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ में इस बार कट्टर हिंदुत्व का तड़का लगने जा रहा है। सत्ता संभालने के बाद यहां कांग्रेस ने सॉफ्ट हिंदुत्व को अपनाया था, लेकिन अब उसका जवाब भाजपा कट्टर हिंदुत्व से देने जा रही है। कवर्धा और साजा क्षेत्र में उतारे गए प्रत्याशी इसकी महज एक बानगी है। इससे पहले भाजपा का टिकट वितरण काफी कुछ संघ से जुड़े नेताओं के सर्वे पर निर्भर रहा। संघ से जुड़े और उसके द्वारा अनुशंसित नेताओं को टिकट वितरण में तवज्जो मिली। अब छत्तीसगढ़ में चुनाव जितवाने की जिम्मेदारी भी संघ के ही कंधों पर डाली गई है। इस चुनाव में भाजपा की ओर से चुनाव प्रचार के लिए यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ व असम के सीएम हेमंत बिस्वा सरमा जैसे कट्टर नेताओं को बुलाया जा रहा है। पीएम मोदी और अमित शाह का आना तो तय ही है। इसे भी कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व की काट के रूप में देखा जा रहा है। छत्तीसगढ़ में भाजपा के लिए धर्मांतरण और हिंदुत्व तो प्रारम्भ से ही मुद्दा रहे हैं।
2 साल पहले अक्टूबर के ही महीने में झंडा लगाने को लेकर हुए विवाद के बाद कवर्धा में साम्प्रदायिक दंगों के हालात बने थे। इस मामले में विजय शर्मा नामक युवक का नाम आया, इस अकेले युवक पर दूसरे पक्ष के लोगों द्वारा हमला करने और पीटने के वीडियो भी वायरल हुए। अपराध भी दर्ज हुआ। अब उसी विजय शर्मा को भाजपा ने कवर्धा विधानसभा क्षेत्र से अपना प्रत्याशी घोषित किया है। कवर्धा में वर्तमान में मोहम्मद अकबर विधायक हैं, जो छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का बड़ा अल्पसंख्यक चेहरा हैं। उनके खिलाफ विजय शर्मा को उतारना भाजपा का एक बड़ा दाँव है। बता दें कि टिकट मिलने के बाद विजय शर्मा ने अपने चुनाव अभियान की शुरूआत भगवा ध्वज की पूजा कर की थी। एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम तब देखने को मिला, जब पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की नामांकन रैली में अमित शाह के साथ साजा प्रत्याशी ईश्वर साहू दिखाई दिए। ईश्वर, उस भुनेश्वर साहू के पिता हैं, जिनकी बेमेतरा के बिरनपुर में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान हत्या कर दी गई। यह इलाका भी साम्प्रदायिकता की आंच में झुलसता रहा। उस दंगे में मारे गए भुनेश्वर के पिता को टिकट देना और उन्हें अमित शाह के कार्यक्रम में मंचस्थ करना भी भाजपा की बड़ी रणनीति का ही हिस्सा है।
शाह के कार्यक्रम में ईश्वर की मौजूदगी
गृहमंत्री अमित शाह का कार्यक्रम राजनांदगांव में था, लेकिन इस दौरान मंच पर साजा के भाजपा प्रत्याशी ईश्वर साहू भी नजर आए। सवाल उठा कि ईश्वर साहू का शाह के मंच पर होना किस बात का संकेत है? इसके सियासी मायने क्या हैं? ये सवाल छत्तीसगढ़ के सियासी गलियारे में तेजी से तैर रहा है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि ईश्वर कोई बड़ा राजनीतिक नाम नहीं हैं। दरअसल, ईश्वर साहू को शाह के मंच पर जगह देना भाजपा की एक तीर से तीन शिकार करने की रणनीति मानी जा रही है। एक, ईश्वर जिस साहू समाज से आते हैं वह छत्तीसगढ़ की सबसे प्रभावी ओबीसी जातियों में से एक है। दूसरा, ईश्वर साहू का न तो कोई राजनीतिक बैकग्राउंड है और न ही वे कभी राजनीति में सक्रिय ही रहे हैं। वे जातिगत समीकरण के साथ ही जातिगत जनगणना के दांव की काट के लिए गरीब कार्ड के सांचे में भी फिट बैठते हैं। इसी साल 6 अप्रैल को बेमेतरा जिले के बिरनपुर गांव में सांप्रदायिक झड़प की घटना में भुवनेश्वर साहू नामक युवक की मौत हो गई थी। ईश्वर साहू उसी भुवनेश्वर के पिता हैं। इस तरह वे हिंदुत्व को धार देने की रणनीति में भी फिट हैं। ईश्वर साहू ने टिकट मिलने के बाद कहा कि मेरे बेटे को न्याय मिले, इसके लिए हर हिंदू के घर जाकर न्याय की गुहार लगाऊंगा। बेटे की हत्या के समय सभी हिंदुओं ने मेरा समर्थन किया था। उन्होंने साथ ही ये भी कहा कि भाजपा ने एक गरीब को अपना सदस्य बनने का मौका दिया, इसके लिए पार्टी को धन्यवाद। हिंदुत्व को धार देने के संकेत और गरीब कार्ड, दोनों की झलक ईश्वर के इस बयान में है।
साहू कितने असरदार?
2019 में लोकसभा चुनाव प्रचार के लिए छत्तीसगढ़ आए पीएम मोदी ने अपने प्रचार अभियान के दौरान एक बड़ा दांव चला। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में जो साहू समाज के लोग हैं, इसी समाज को गुजरात में मोदी कहा जाता है। भाजपा छत्तीसगढ़ की सत्ता गंवाने के बाद लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 11 में से 9 सीटें जीतने में सफल रही तो इसके पीछे मोदी के इस बयान से बने माहौल को भी श्रेय दिया गया। अनुमानों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में साहू समाज की आबादी करीब 12 फीसदी है। कई सीटों पर जीत और हार तय करने में समाज के मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों ही दल साहू समाज के अधिक उम्मीदवारों पर दांव लगाते रहे हैं। साल 2018 के चुनाव में भाजपा ने प्रदेश की 51 सामान्य सीटों में से 14 पर साहू समाज के नेताओं को उम्मीदवार बनाया था। कांग्रेस ने समाज के आठ नेताओं पर दांव लगाया था। विधानसभा चुनाव में क्योंकि इस समाज ने कांग्रेस का समर्थन किया था, इसलिए भाजपा से केवल एक साहू चेहरे रंजना साहू को जीत मिली थी। वहीं, कांग्रेस के आठ में से पांच साहू नेता चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचने में सफल रहे थे। इनमें कसडोल सीट से शकुंतला साहू, अभनपुर सीट से धनेंद्र साहू, दुर्ग ग्रामीण से ताम्रध्वज साहू, डोंगरगांव से दलेश्वर साहू और खुज्जी से चन्नी चंदू साहू शामिल हैं।
इस बार फिर साहू समाज भाजपा के साथ
2013 चुनाव की बात करें तो भाजपा से 12 और कांग्रेस से साहू समाज के 8 उम्मीदवार मैदान में थे। तब भाजपा की टिकट पर 5 और कांग्रेस की टिकट पर 4 साहू उम्मीदवार जीतकर आए। 90 सदस्यीय विधानसभा में तब कुल 9 विधायक इस समाज से थे। आंकड़ों के लिहाज से यह 10 फीसद बैठता है। 2018 में भाजपा 15 साल बाद सत्ता से बेदखल हुई तो इसके पीछे भी साहू समाज के छिटके वोटों को प्रमुख वजह बताया गया। इस बार हालात जुदा हैं। साहू समाज का समर्थन इस बार भाजपा के साथ है। ऐसा इसलिए, क्योंकि पिछले चुनाव में इस समाज को पूरा भरोसा का ताम्रध्वज साहू मुख्यमंत्री बनेंगे, लेकिन इस बार कांग्रेस का सीएम चेहरा पहले से तय है। भाजपा ने इस बार साहू समाज को साधने के साथ ही ईश्वर के सहारे गरीब और हिंदुत्व का कार्ड चल दिया है। राजनांदगांव में शाह और रमन जैसे नेताओं के साथ मंच पर ईश्वर को जगह देकर भाजपा ने बड़ा संदेश देने की कोशिश की है। अब ये रणनीति कितनी कारगर साबित होती है, यह तो नतीजे ही बताएंगे।




